प्रार्थना केवल शब्दों का उच्चारण नहीं है, बल्कि यह हृदय की वह अवस्था है जहाँ मनुष्य अपने भावों को परमात्मा के सामने समर्पित करता है। यह एक दिव्य संबंध स्थापित करती है और व्यक्ति को भीतर से शक्ति, साहस और शांति प्रदान करती है। प्रार्थना में इतनी शक्ति होती है कि वह मन को अत्यंत कठिन परिस्थितियों में भी स्थिर रख सकती है।
प्रार्थना का मुख्य उद्देश्य मनुष्य को ईश्वर के करीब लाना है। यह हमें विनम्र बनाती है और यह सिखाती है कि जीवन में सब कुछ हमारे नियंत्रण में नहीं होता। जब व्यक्ति प्रार्थना करता है, तो उसके मन में सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न होती है और नकारात्मक भावनाएँ धीरे-धीरे समाप्त होती हैं। यही कारण है कि प्रार्थना तनाव, दुख और उलझनों में आशा का प्रकाश बन जाती है।
प्रार्थना का प्रभाव तभी गहरा होता है जब वह सच्चे भाव, श्रद्धा और विश्वास से की जाए। नियमित प्रार्थना मन को पवित्र बनाती है, आत्मविश्वास बढ़ाती है और धैर्य प्रदान करती है। यह व्यक्ति को भीतर से मजबूत बनाती है, जिससे वह जीवन की चुनौतियों का सामना सहजता से कर पाता है।
प्रार्थना मन और आत्मा दोनों को जोड़ने वाला आध्यात्मिक सेतु है, जो हमें परमात्मा की अनंत ऊर्जा से जोड़ता है।
