हम अक्सर शरीर, नाम, रूप और अपनी दैनिक भूमिकाओं को ही अपनी पहचान मान लेते हैं, पर वास्तव में मनुष्य का असली स्वरूप उसकी आत्मा है। आत्मा न जन्म लेती है और न मरती है; वह केवल शरीर रूपी वस्त्र बदलती है। आध्यात्मिक जागरण का अर्थ है इस सत्य को गहराई से समझना और जीवन में लागू करना। जब किसी व्यक्ति को यह अनुभव होने लगता है कि वह केवल शरीर नहीं बल्कि एक दिव्य ऊर्जा है, तो उसके भीतर भय, अहंकार और असुरक्षा धीरे-धीरे समाप्त होने लगती है।
आत्मा का स्वरूप शांति, प्रेम और प्रकाश से भरा हुआ है। जब व्यक्ति ध्यान, साधना या स्वाध्याय करता है, तो वह धीरे-धीरे अपने भीतर की दिव्यता को पहचानने लगता है। यह पहचान उसे बाहरी परिस्थितियों से प्रभावित होने से बचाती है। जीवन के उतार-चढ़ाव उसके मन को उतना विचलित नहीं करते, जितना पहले करते थे।
आध्यात्मिक जागरण मनुष्य के व्यवहार में भी सकारात्मक परिवर्तन लाता है। वह क्षमा को अपनाता है, क्रोध कम होता है और सहानुभूति बढ़ती है। ऐसे व्यक्ति का जीवन सरल, संयमित और उद्देश्यपूर्ण हो जाता है। अंततः आत्मा के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान हमें उस परम सत्य के करीब ले जाता है, जिससे हमारा अस्तित्व जुड़ा हुआ है। यही आत्म-साक्षात्कार की दिशा में पहला कदम है।
