‘धर्म’ और ‘सनातन’ में अंतर – क्यों दोनों शब्द महत्वपूर्ण हैं?

अक्सर लोग ‘धर्म’ और ‘सनातन’ शब्दों को समान समझ लेते हैं, जबकि इनके अर्थ और भाव अलग हैं। ‘धर्म’ वह जीवन-पद्धति है जो मानव को सत्य, नैतिकता और कर्तव्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। इसका अर्थ है—धारण करने योग्य आचरण। इसलिए धर्म किसी विशेष मज़हब तक सीमित नहीं, बल्कि व्यक्ति, समाज और प्रकृति के संतुलन का मार्ग है।

इसके विपरीत ‘सनातन’ वह है जो अनादि और अनंत है, जो समय के साथ न बदले और जो सृष्टि के मूल सिद्धांतों पर आधारित हो। सनातन धर्म का अर्थ है — वह व्यवस्था जो युगों से अस्तित्व में है और आने वाले युगों में भी बनी रहेगी। इसमें सत्य, करुणा, अहिंसा, दान, संयम और धर्मपालन जैसे सार्वभौमिक सिद्धांत शामिल हैं।

धर्म व्यवहार का मार्ग है, जबकि सनातन उसकी जड़ है। धर्म हमारे रोज़मर्रा के आचरण को प्रभावित करता है, और सनातन इस आचरण को स्थिरता देने वाला मूल सिद्धांत है। दोनों मिलकर सम्पूर्ण जीवन के लिए मूल्य-व्यवस्था बनाते हैं।

इस अंतर को समझना इसलिए आवश्यक है क्योंकि यह हमें भारतीय संस्कृति के गहन ज्ञान से जोड़ता है और बताता है कि क्यों सनातन परंपराएँ आज भी मानव जीवन को दिशा प्रदान करती हैं।