प्राणप्रतिष्ठा वह वैदिक प्रक्रिया है जिसके माध्यम से किसी मूर्ति, यंत्र या धार्मिक स्थल में आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार किया जाता है। यह मान्यता है कि जब तक किसी देव प्रतिमा में प्राणप्रतिष्ठा नहीं होती, तब तक वह केवल एक ‘प्रतिमा’ रहती है; लेकिन विधिवत मंत्रोच्चारण, हवन और संकल्प के बाद वही प्रतिमा दिव्य शक्ति का केंद्र बन जाती है। इसका उद्देश्य भक्तों के लिए एक ऐसा माध्यम स्थापित करना होता है जहाँ वे ईश्वर से सहज रूप से जुड़ सकें।
आध्यात्मिक रूप से माना जाता है कि प्राणप्रतिष्ठा के दौरान पुरोहित विशिष्ट मंत्रों के माध्यम से ब्रह्मांडीय ऊर्जा को आमंत्रित करते हैं और देवता के स्वरूप को उस प्रतिमा में प्रतिष्ठित करते हैं। यह प्रक्रिया अत्यंत पवित्र मानी जाती है और इसके दौरान स्थान को शुद्ध रखने के लिए विशेष विधान अपनाए जाते हैं।
वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो मंत्रोच्चारण, अग्निहोत्र और धूप-दीप से वातावरण में सकारात्मक कम्पन और सुगंधित कण फैलते हैं, जो मन और मस्तिष्क को शांत करते हैं। इससे वातावरण में पवित्रता महसूस होती है और मन एकाग्र होता है।
इसी कारण, हजारों वर्षों से प्राणप्रतिष्ठा को मंदिरों और धार्मिक स्थलों का सबसे महत्वपूर्ण संस्कार माना जाता है।
