प्रह्लाद और हिरण्यकश्यप की कथा सत्य, भक्ति और परमात्मा की रक्षा का अनोखा उदाहरण है। हिरण्यकश्यप स्वयं को ईश्वर से श्रेष्ठ मानता था और चाहता था कि उसका पुत्र प्रह्लाद—जो विष्णु का अनन्य भक्त था—उसे ही देवता माने। प्रह्लाद ने सत्य और भक्ति से कभी विचलित नहीं हुआ।
कथा में हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को अनेक यातनाएँ दीं—ऊँची चट्टानों से गिरवाना, विष देना, सर्प कक्ष में बंद करना—लेकिन हर बार भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित रहे। जब अत्याचार की सीमा पार हुई, तब भगवान विष्णु ने नृसिंह अवतार धारण कर स्तंभ से प्रकट होकर हिरण्यकश्यप का वध किया।
यह कथा दर्शाती है कि अनंत अत्याचार भी भक्त को नहीं डिगा सकता, और धर्म की रक्षा के लिए परमात्मा हर रूप में प्रकट होते हैं, भले वह रूप नियमों के बीच भी क्यों न हो—जैसे न मनुष्य, न पशु; न दिन, न रात; न अंदर, न बाहर। यह प्रसंग आज भी बच्चों और बड़ों के लिए समान रूप से प्रेरणादायक माना जाता है।
प्रह्लाद-हिरण्यकश्यप कथा: भक्तिभाव, सत्य की विजय और नृसिंह अवतार का प्राकट्य
