परशुराम जी की जन्म-कथा ऋषि परंपरा, तपस्या और धर्म-स्थापना की अद्भुत मिसाल मानी जाती है। पौराणिक विवरण के अनुसार परशुराम का जन्म महान तपस्वी ऋषि जमदग्नि और माता रेणुका के घर हुआ। कथा कहती है कि माता रेणुका इतनी पवित्र और सात्त्विक थीं कि वे प्रतिदिन नदी से ऐसा जल लाती थीं जिसकी निर्मलता से ऋषिगृह में भी तेज बढ़ जाता था। एक दिन परिस्थितिवश उनका दिव्य तेज क्षीण प्रतीत हुआ और ऋषि जमदग्नि ने इसे तपोभंग माना। इसी प्रसंग में परशुराम की कर्तव्यनिष्ठा और आज्ञाकारिता की परीक्षा होती है। कथा अनुसार परशुराम ने पिता की आज्ञा मानकर कठोर निर्णय का पालन किया, जिससे देवताओं ने उन्हें वरदान एवं दिव्य शक्तियाँ प्रदान कीं।
यह कथा महज एक धार्मिक प्रसंग नहीं बल्कि “धर्मपालन, माता-पिता सम्मान और आत्म-संयम” जैसे मूल्यों पर आधारित एक गहन संदेश देती है। कथा यह भी दर्शाती है कि शक्ति तभी सार्थक है जब उसका प्रयोग अधर्म के विरुद्ध और न्याय की रक्षा हेतु किया जाए। परशुराम जी को छठा अवतार माना गया है, जिनका ध्येय समाज में संतुलन लाना और क्षत्रिय अहंकार को संयमित कर धर्म की रक्षा करना बताया गया है। यह पौराणिक कथा आज भी चरित्र, निष्ठा और साहस का प्रेरक स्रोत मानी जाती है।
भगवान परशुराम की जन्म-कथा: ऋषि शक्ति, माँ रेणुका और तपःबल का वर्णन
