समुद्र मंथन की कथा: देवासुर संघर्ष, अमृत-कलश और दिव्य रत्नों का उद्भव

समुद्र मंथन की कथा देवासुर संघर्ष, अमृत-कलश और दिव्य रत्नों का उद्भव

समुद्र मंथन पौराणिक इतिहास का वह महत्त्वपूर्ण प्रसंग है जिसमें देवताओं और असुरों के मध्य एक अनोखा सहयोग दिखाई देता है। कथा के अनुसार इंद्र द्वारा महर्षि दुर्वासा के शाप से देवगण निर्बल हो गए थे। उन्हें पुनः शक्तिशाली बनाने के लिए भगवान विष्णु ने क्षीरसागर के मंथन की योजना प्रस्तुत की। मंथन-दंड के रूप में मंदराचल पर्वत और रस्सी के रूप में वासुकी नाग को चुना गया।
मंथन के दौरान कालकूट विष निकला, जिसे भगवान शिव ने विषपान कर अपने कंठ में धारण किया और नीलकंठ कहलाए। इसके बाद लक्ष्मी, धन्वंतरी तथा अनेक दिव्य रत्न प्रकट हुए। धन्वंतरी के हाथ में आये अमृत-कलश को लेकर देव-असुरों में संघर्ष उत्पन्न हुआ, जिसे भगवान विष्णु के मोहिनी रूप ने संतुलित किया।
समुद्र मंथन का संदेश केवल पौराणिक इतिहास तक सीमित नहीं बल्कि गहन प्रतीकात्मक अर्थों को भी दर्शाता है—जैसे सहयोग और समन्वय से ही अद्भुत परिणाम प्राप्त होते हैं। साथ ही यह भी कि अच्छे कार्यों में कठिनाइयाँ और विष समान बाधाएँ अवश्य आती हैं, परंतु धैर्य और विवेक से वही बाधाएँ कल्याणकारी उपलब्धियों में परिवर्तित हो सकती हैं।