सत्यवान-सावित्री कथा: पतिव्रत-धर्म, साहस और यमराज को भी झुकाने वाली भक्ति

सत्यवान-सावित्री कथा पतिव्रत-धर्म, साहस और यमराज को भी झुकाने वाली भक्ति

सावित्री की कथा भारतीय संस्कृति में पतिव्रत, समर्पण और स्त्री-शक्ति का अद्वितीय प्रमाण मानी जाती है। सत्यवान को अल्पायु का श्राप था, जिसके बारे में नारद मुनि ने सावित्री को पहले ही चेताया था, किंतु सावित्री ने सत्यवान को ही जीवनसाथी चुना क्योंकि उनका प्रेम सच्चा और निष्ठावान था।
जिस दिन सत्यवान का निधन होना था, सावित्री उसके साथ वन में गईं। सत्यवान के प्राण लेने हेतु जब यमराज प्रकट हुए, तब सावित्री उनके पीछे-पीछे चलती गईं। यमराज ने बार-बार उन्हें पुनः लौटने के लिए कहा, परंतु सावित्री ने धर्म, करुणा और नैतिक तर्कों से संवाद जारी रखा।
उनकी दृढ़ता और शुद्ध भक्ति से प्रसन्न होकर यमराज ने सत्यवान को दीर्घायु प्रदान की और दंपति का सुखपूर्वक गृहस्थ जीवन पुनः स्थापित हुआ।
इस कथा का संदेश है—भक्ति, धर्म और सत्यनिष्ठ प्रेम किसी भी संकट को मात दे सकते हैं। यह कथा आज भी “वट सावित्री” व्रत का आधार है।