सती-दाह और पार्वती के पुनर्जन्म की कथा: भक्तिभाव, तपस्या और त्रिदेव संतुलन

सती-दाह और पार्वती के पुनर्जन्म की कथा भक्तिभाव, तपस्या और त्रिदेव संतुलन

सती-दाह की कथा पौराणिक इतिहास का अत्यंत करुण Yet प्रेरणादायक प्रसंग माना जाता है। राजा दक्ष द्वारा शिव का अपमान सहन न कर पाने पर सती ने अग्नि-समाधि ले ली, जिससे ब्रह्मांडीय संतुलन विचलित हो गया। इस घटना के बाद भगवान शिव तांडव करते हुए वीरभद्र को उत्पन्न करते हैं, जिसने दक्ष-यज्ञ को ध्वस्त किया।
कथा आगे बताती है कि सती ने हिमालयराज के घर पार्वती के रूप में पुनर्जन्म लिया। बाल्यावस्था से ही उनमें शिव के प्रति भक्ति और वैराग्य था। उन्होंने कठोर तपस्या कर भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त किया। उनकी तपस्या में महीनों तक केवल हवा पर निर्वाह और ध्यान-साधना का अभ्यास शामिल था।
यह कथा नारी-शक्ति, तपस्या और समर्पण की गहरी मिसाल है। साथ ही यह भी दर्शाती है कि ब्रह्मांडीय संतुलन प्रेम, त्याग और धर्मनिष्ठ आचरण से ही पुनः स्थापित होता है। शिव-पार्वती का मिलन केवल विवाह का उत्सव नहीं बल्कि “ऊर्जा और चेतना” के संगम का पौराणिक प्रतीक माना जाता है—जो संसार के सृजन और संतुलन का आधार है।