दधीचि ऋषि ने देवताओं की रक्षा के लिए अपना शरीर तक अर्पित कर दिया। असुर वृत्रासुर के वध के लिए वज्र बनाने हेतु उनके अस्थियों की आवश्यकता थी। देवताओं के अनुरोध पर दधीचि ने हँसते हुए शरीर छोड़ दिया ताकि संसार का कल्याण हो सके।
यह कथा “परमार्थ त्याग” का सर्वोच्च उदाहरण है—जहाँ व्यक्तिगत हित से ऊपर लोक-हित को रखा जाता है। यह भारतीय संस्कृति में त्याग और बलिदान का आधार मानी जाती है।
दधीचि ऋषि कथा: आत्म-त्याग और देव-रक्षा के लिए अद्भुत बलिदान
