आत्म-साक्षात्कार का अर्थ है—अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानना। मनुष्य अक्सर अपने शरीर, नाम, रिश्तों और उपलब्धियों से ही अपनी पहचान जोड़ लेता है, लेकिन आत्म-साक्षात्कार इन सबके परे जाकर उस परम सत्य को जानना है, जिसके आधार पर जीवन चलता है। आत्मा अजर-अमर, अनंत और शुद्ध प्रकाश है। इसका अनुभव ही आध्यात्मिक यात्रा का चरम उद्देश्य माना गया है।
आत्म-साक्षात्कार अचानक नहीं होता; यह धीरे-धीरे साधना, धैर्य और निरंतर अभ्यास से प्राप्त होता है। ध्यान सबसे प्रभावी साधन है जो मनुष्य को अपने भीतर ले जाने में सहायता करता है। जब मन शांत होता है, तब व्यक्ति अपनी चेतना की गहराइयों को महसूस कर पाता है। इसी अवस्था में उसे यह समझ आता है कि वह न तो शरीर है, न भावनाएँ, न विचार—बल्कि इन सबका साक्षी है।
आत्म-साक्षात्कार का अनुभव व्यक्ति की दृष्टि बदल देता है। वह संसार को अलग नजर से देखने लगता है—जहाँ भय कम, प्रेम अधिक और अपेक्षाएँ न्यून होती हैं। व्यक्ति अधिक दयालु, विनम्र और शांत हो जाता है।
इस अनुभूति से जीवन में ऐसी स्थिरता आती है जो बाहरी परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होती। आत्म-साक्षात्कार हमें उस मूल स्रोत से जोड़ता है जहाँ से शक्ति, शांति और आनंद प्रवाहित होते हैं।
